पहली भारतीय को मिला LUCE Emerging Talent Award 2026, नेहा सक्का ने दिया समावेशी विकास का संदेश

जब दुनिया Climate Change, Renewable Energy, Electric Vehicles और Green Transition की बात करती है, तो चर्चा अक्सर नई तकनीकों, निवेश, बैटरी निर्माण और बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स तक सीमित रह जाती है। लेकिन इस बदलाव के केंद्र में एक ऐसा सवाल है, जो भविष्य की दिशा तय करेगा—इन नए अवसरों तक पहुंच किसकी होगी?

इसी महत्वपूर्ण प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता से उठाने वाली राजस्थान की इंजीनियर नेहा सक्का को हाल ही में इटली के फ्लोरेंस स्थित European University Institute में आयोजित समारोह के दौरान LUCE Emerging Talent Award 2026 से सम्मानित किया गया। वह यह प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त करने वाली पहली भारतीय बनी हैं।

हालांकि नेहा सक्का के अनुसार यह उपलब्धि केवल एक व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि उन लाखों लोगों की आवाज़ है जो प्रतिभाशाली और सक्षम होने के बावजूद अवसरों तक समान पहुंच नहीं बना पाते।

शिक्षा मिली, लेकिन अवसर नहीं

फ्लोरेंस में आयोजित कार्यक्रम के दौरान महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और रोजगार से जुड़े विषयों पर चर्चा करते हुए नेहा सक्का ने बताया कि भारत में बड़ी संख्या में महिलाएं शिक्षा प्राप्त करती हैं, लेकिन उन्हें अपनी शिक्षा को आर्थिक स्वतंत्रता और पेशेवर पहचान में बदलने का अवसर नहीं मिल पाता।

उन्होंने इसका उदाहरण अपनी मां जाहिदा बेगम के जीवन से दिया। विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण उनकी आगे की पढ़ाई और पेशेवर संभावनाएं सीमित हो गईं। वे शिक्षित और सक्षम थीं, लेकिन उन्हें अपनी क्षमता के अनुरूप योगदान देने का अवसर नहीं मिल सका।

यही अनुभव आगे चलकर नेहा सक्का की सोच और सामाजिक दृष्टिकोण की नींव बना।

बदलाव की शुरुआत परिवार से

नेहा सक्का मानती हैं कि महिलाओं की प्रगति केवल महिलाओं के संघर्ष की कहानी नहीं होती, बल्कि उन परिवारों और पुरुषों की भी कहानी होती है जो स्थापित सामाजिक धारणाओं को चुनौती देने का साहस दिखाते हैं।

उनके पितामह मरहूम हाजी मोहम्मद अब्दुल लतीफ ने सीमित संसाधनों के बावजूद बेटियों की शिक्षा का समर्थन किया और अपनी पोती को इंजीनियर बनते देखने का सपना देखा। वहीं उनके नानाजी हाजी खुदा बक्स सक्का ने बचपन से ही गणित और विज्ञान में उनकी मजबूत नींव तैयार की।

ऐसे समय में जब STEM शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी पर व्यापक चर्चा भी नहीं होती थी, परिवार ने तकनीकी शिक्षा को लड़कियों का स्वाभाविक अधिकार माना।

पांच पीढ़ियों बाद जन्मी पहली बेटी

नेहा सक्का का जन्म उनके परिवार में पांच पीढ़ियों बाद हुई पहली बेटी के रूप में हुआ। समय के साथ वही बेटी समाज की पहली प्रोफेशनल महिला इंजीनियर बनी और आज अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रही है।

उनकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि अवसर मिलने पर एक लड़की न केवल अपना भविष्य बदल सकती है, बल्कि पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ियों की दिशा भी बदल सकती है।

Green Transition में महिलाओं की भागीदारी क्यों जरूरी है?

भारत आज Renewable Energy, Electric Mobility और Green Industries के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस विकास की कहानी में महिलाओं की भागीदारी अभी भी सीमित है।

उद्योग से जुड़े उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि भारत के Renewable Energy Workforce में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 11 प्रतिशत है, जबकि वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र में नेतृत्वकारी पदों पर महिलाओं की भागीदारी 15 प्रतिशत से भी कम है।

ऐसे में सवाल केवल तकनीकी विकास का नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और समान अवसरों का भी है। भविष्य की अर्थव्यवस्था का निर्माण करने वालों में महिलाओं, ग्रामीण युवाओं और वंचित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है।

5,500 से अधिक युवाओं तक पहुंच

अपने सामाजिक प्रयासों के तहत नेहा सक्का ने Trust EV Awareness Oath Program (TEVAOP) के माध्यम से युवाओं, महिलाओं, ग्रामीण क्षेत्रों और प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थियों तक Green Skills और Electric Mobility की जानकारी पहुंचाने का कार्य किया है।

इस पहल के अंतर्गत:

  • 5,500 से अधिक प्रतिभागियों तक पहुंच
  • 130 से अधिक कार्यक्रम
  • 450 घंटे से अधिक प्रशिक्षण और संवाद गतिविधियां

संचालित की जा चुकी हैं।

असली चुनौती Talent नहीं, Access है

फ्लोरेंस में अपने संबोधन के दौरान नेहा सक्का ने कहा कि Climate Change सभी को प्रभावित करता है, लेकिन उससे जुड़े अवसर अभी भी सभी तक समान रूप से नहीं पहुंचते।

उनके अनुसार दुनिया में प्रतिभा की कमी नहीं है। असली चुनौती यह है कि योग्य और सक्षम लोगों तक अवसर कैसे पहुंचाए जाएं।

उन्होंने कहा कि Green Transition की सफलता केवल Megawatt क्षमता, Electric Vehicle बिक्री या Carbon Emission Reduction से नहीं मापी जानी चाहिए। इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि इसमें महिलाओं, ग्रामीण युवाओं, प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थियों और वंचित समुदायों की कितनी सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जा सकी।

निष्कर्ष

Climate Change के खिलाफ वैश्विक लड़ाई केवल तकनीकी समाधान खोजने की चुनौती नहीं है। यह समान अवसर, समावेशी विकास और सामाजिक न्याय की भी चुनौती है।

भविष्य केवल नई तकनीक विकसित करने वालों से नहीं बनेगा। भविष्य उन लोगों से भी बनेगा जो यह सुनिश्चित करेंगे कि उन तकनीकों से पैदा होने वाले अवसर समाज के हर वर्ग तक पहुंचें।

और शायद यही वह सवाल है जो आने वाले वर्षों में Green Transition की वास्तविक सफलता को परिभाषित करेगा—अवसर किसे मिलेगा?

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